एएलडी या अल्कोहॉलिक लिवर डिजीज क्या है

अल्कोहॉलिक लिवर डिजीज (एएलडी) लिवर की उन बीमारियों के एक समूह को कहते हैं, जो ज़्यादा शराब पीने से होती हैं। मैं एक लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन हूँ और मेरे पास अक्सर ऐसे मरीज़ आते हैं, जिनके जीवन पर एएलडी का बहुत बुरा असर हुआ है। अगर इसका जल्दी पता चल जाए तो इसे रोका और ठीक किया जा सकता है। लेकिन अगर यह बीमारी बढ़ जाए तो यह ऐसा नुकसान कर सकता है जिसकी भरपाई नहीं हो सकती और फिर लिवर ट्रांसप्लांट की ज़रूरत पड़ेगी। परामर्श के लिये, डॉ. स्वप्निल शर्मा, कंसल्टेन्ट लिवर ट्रांसप्लांट, एचपीबी और जीआई सर्जन, वॉकहार्ट हॉस्पिटल्स अब रायपुर में उपलब्ध हैं।
अल्कोहॉलिक लिवर डिजीज के प्रकार
एएलडी में मुख्य रूप से तीन अवस्थाएं होती हैं-
1. अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज (स्टीटोसिस)- यह सबसे हल्की अवस्था होती है, जिसमें अल्कोहल के अत्यधिक सेवन के कारण लिवर की कोशिकाओं में काफी वसा एकत्र हो जाता है। यह स्थिति ठीक हो सकती है, अगर अल्कोहल का सेवन बंद कर दिया जाए।
2. अल्कोहॉलिक हेपेटाइटिस-इस अवस्था में लिवर की कोशिकाओं में सूजन और क्षति होती है। मरीजों को पीलिया, पेटदर्द और आलस महसूस होता है। अल्कोहॉलिक हेपेटाइटिस की गंभीर स्थिति में लिवर फेलियर हो सकता है।
3. अल्कोहॉलिक सिरोसिस- यह अंतिम अवस्था है, जिसमें लिवर पर धब्बे और अपूरणीय क्षति होती है। सिरोसिस से होने वाली जटिलताओं में पोर्टल हाइपरटेंशन, वैरिसील ब्लीडिंग, एसाइट्स और हीपैटिक एंसेफैलोपैथी शामिल हैं।
जोखिम कारक और पैथोफिजियोलॉजी
इसका मुख्य कारण है बहुत ज़्यादा शराब पीना, लेकिन ज़रूरी नहीं है कि बहुत ज़्यादा शराब पीने से ही एएलडी हो। इसके कुछ और कारण भी हैं, जैसे आनुवंशिक संरचना। कुछ लोगों को यह बीमारी अपने परिवार से मिलती है। महिलाओं में यह बीमारी होने का खतरा ज़्यादा होता है। अगर किसी को पहले से ही मोटापा या वायरल हेपेटाइटिस जैसी बीमारी है, तो उसे एएलडी होने का खतरा बढ़ जाता है। अगर शरीर में ज़रूरी पोषक तत्वों की कमी है, तो भी एएलडी हो सकता है। अगर कोई लंबे समय से शराब पी रहा है, तो उसके लिवर के सेल्स का काम बदल जाएगा, जिससे ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और जलन बढ़ जाएगी और फाइब्रोसिस और लिवर के खराब होने जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।
बीमारी का पता लगाना एवं निगरानी
इसका पता लगाने में चिकित्सकीय मूल्यांकन, लैब टेस्ट और इमेजिंग के अध्ययन किये जाते हैं। इसके प्रमुख संकेतक हैं लिवर के एंज़ाइम्स बढऩा (एएसटी और एएलटी), बिलिरुबिन ज्यादा होना और एल्बुमिन कम होना। अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन या एमआरआई से वसा में बदलाव, फाइब्रोसिस या सिरोसिस का पता चल सकता है। लिवर बायोप्सी से बीमारी के निदान और अवस्था की पुष्टि हो सकती है।
उपचार की रणनीतियाँ
लिवर का ज्यादा नुकसान होने से रोकने और जटिलताओं को दूर करने के लिये एएलडी का इलाज
1. शराब पीना छोडऩा इसके उपचार का आधार होता है। अल्कोहॉलिज्म के विशेषज्ञों और थेरैपी की मदद तथा नाल्ट्रेक्जोन या एकामप्रोसेट जैसी दवाएं परहेज रखने में सहायक होती हैं।
2. न्यूट्रीशनल थेरैपी- एएलडी के मरीजों को अक्सर कुपोषण होता है। ऐसे में बी-कॉम्पलेक्स विटामिन्स और थियामाइन के साथ ज्यादा प्रोटीन वाले आहार को जरूरी माना जाता है।
3. दवाएं- सीवियर अल्कोहॉलिक हीपैटाइटिस के मरीजों में कोर्टिकोस्टीरॉइड्स जैसी इनफ्लैमेटरी दवाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है।
4. जटिलताओं को संभालना: एसाइट्स के लिये डाइयूरेटिक्स, पोर्टल हाइपरटेंशन के लिये बीटा-ब्लॉकर्स और संक्रमणों के लिये एंटीबायोटिक्स आमतौर पर दिये जाते हैं।
5. लिवर ट्रांसप्लांटेशन- लिवर की अंतिम अवस्था वाले उन मरीजों को जीने का दूसरा मौका ट्रांसप्लांटेशन के जरिये दिया जाता है, जो परहेज कर सकते हैं। उन्हें परहेज रखने की क्षमता साबित करनी होगी और उनका विस्तृत मूल्यांकन किया जाएगा।
रोकथाम एवं जागरूकता
बहुत ज्यादा शराब पीने से होने वाले नुकसानों पर सार्वजनिक शिक्षा को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये। बीमारी की शुरूआती अवस्था में हुए नुकसान की जाँच से इसे बढऩे से रोका जा सकता है। बहुत ज्यादा शराब पीने वाले लोगों के लिये उचित सहयोग प्रणालियों के साथ पुनर्वास कार्यक्रम महत्वपूर्ण होते हैं।
एक लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन होने के नाते, मैंने एएलडी के मरीज़ों में जीवनशैली में बदलाव और सही समय पर इलाज का बहुत अच्छा असर देखा है। इस बीमारी को रोकने का सबसे अच्छा तरीका है लोगों में जागरूकता बढ़ाना और जल्दी इलाज शुरू करना। साथ मिलकर हम इस बीमारी से लड़ सकते हैं जिसे रोका जा सकता है और इससे पीडि़त लोगों को उम्मीद दे सकते हैं।



