
लोक गीतों से पूनम विराट और राहगीर ने बांधा समां
रायपुर। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में जारी हिंद युग्म महोत्सव के दूसरे दिन साहित्य, सिनेमा, संगीत और संवाद का अनूठा संगम देखने को मिला। सुबह 10 बजे से रात 10 बजे तक लगातार चलने वाले सत्रों ने पाठकों, लेखकों और दर्शकों को एक नए साहित्यिक उत्सव का अनुभव कराया।
दिन की शुरुआत ‘रील्स, रिव्यू और रीडिंग’ सत्र से हुई, जिसमें अर्पित आर्या, रेणु मिश्रा, मधु चतुर्वेदी और उज्ज्वल मल्हावनी ने सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स के साहित्यिक प्रभाव पर चर्चा की। इसके बाद ‘स्त्री लेखन: दोहरी दुनिया का सफऱ’ सत्र में सुषमा गुप्ता, अंकिता जैन, चित्रा पंवार, ज्योति शर्मा और मुदिता शर्मा ने महिलाओं की लेखन यात्रा और सामाजिक जि़म्मेदारियों के बीच संतुलन पर विचार रखे। चर्चा में यह विचार भी सामने आया कि स्त्रियाँ अब केवल दोहरी नहीं, बल्कि तेहरी जि़म्मेदारियाँ निभा रही हैं—घर-परिवार, सामाजिक दायित्व और स्वयं के व्यक्तित्व को जीने की चुनौतियों के बीच। लेखिका अंकिता जैन ने कहा—‘आज मैं यहाँ अपनी बात रख पा रही हूँ, तो केवल इसलिए कि मेरे पति ने मुझे घर से बाहर निकलने का संबल दिया। वे बच्चों और घर की जि़म्मेदारी सँभालते हैं और कहते हैं—‘तू जा, मैं देख लूँगा।’ जिस दिन हर पति ऐसा कहने लगेगा, उस दिन सचमुच हर क्षेत्र में हमें सदी की महानायिकाएँ मिलेंगी।’
‘न लिख पाने की बेचैनी’ विषय पर राकेश कायस्थ, विजयश्री तनवीर, यतीश कुमार और संगीता मनराल विज ने लेखक की रचनात्मक दुविधाओं पर बात रखी। यतीश कुमार ने कहा—‘कविताएँ आपमें उतरती हैं और कहानियों में आप उनके पीछे खिंचे चले जाते हैं।’ इसी क्रम में ‘नीली गली एवं बारिश और आल्हा’ का विमोचन हुआ तथा ‘नई वाली हिंदी: प्रवृत्ति और पहचान’ विषय पर नीलोत्पल मृणाल ने अपने विचार रखे। ‘साठ सेकंड की कहानियाँ’ सत्र ने दिखाया कि रील्स और शॉर्ट वीडियो साहित्य का नया माध्यम कैसे बन रहे हैं। शाम को मशहूर लेखक दिव्य प्रकाश दुबे के साथ ‘बेस्टसेलर: नाम का जादू या बिक्री का सच?’ सत्र हुआ, जबकि ‘परदे और पन्ने’ संवाद में लेखक वैभव विशाल और कृष्णकांत जोन्नलगड्डा ने दर्शकों को बाँधे रखा। ‘बड़े पर्दे का छत्तीसगढ़’ सत्र में मनोज वर्मा, ऋचा ठाकुर और मीर अली मीर ने क्षेत्रीय सिनेमा की चुनौतियों और संभावनाओं पर चर्चा की।




