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बिहार चुनाव से पहले मोदी सरकार ने चला दोहरा दांव

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आज हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में दो बड़े निर्णय लिए गए। पहला- आठवें केंद्रीय वेतन आयोग की संदर्भ-शर्तों को मंज़ूरी दी गयी और दूसरा- रबी 2025-26 के लिए फॉस्फेटिक और पोटैसिक उर्वरकों पर पोषक तत्व आधारित सब्सिडी दरों को स्वीकृति दी गयी।
आठवें वेतन आयोग का निर्णय लगभग 50 लाख केंद्रीय कर्मियों और 69 लाख पेंशनरों को प्रभावित करेगा। आयोग का नेतृत्व पूर्व न्यायमूर्ति रंजन प्रकाश देसाई करेंगी, जबकि आईआईएम बेंगलुरु के प्रो. पुलक घोष अंशकालिक सदस्य और पेट्रोलियम सचिव पंकज जैन सदस्य-सचिव होंगे। आयोग को 18 महीनों में अपनी अनुशंसाएँ प्रस्तुत करनी हैं और अंतरिम रिपोर्ट जनवरी 2026 तक लागू होने की संभावना जताई गई हैदूसरे निर्णय के तहत, रबी सीजऩ 2025-26 के लिए उर्वरक सब्सिडी का बजटीय प्रावधान लगभग 37,952 करोड़ रखा गया है, जो खरीफ सीजऩ की तुलना में 736 करोड़ अधिक है। सरकार ने यह सुनिश्चित करने की घोषणा की है कि किसानों को डीएपी, एनपीकेएस जैसे उर्वरक सस्ती और सब्सिडी दरों पर उपलब्ध रहें।
देखा जाये तो जब बिहार विधानसभा चुनाव अपने निर्णायक चरण में हैं, तब मोदी सरकार के इन दो आर्थिक निर्णयों का राजनीतिक अर्थ स्पष्ट है। ये कदम न केवल आर्थिक प्रबंधन का हिस्सा हैं, बल्कि सामाजिक वर्गों के रणनीतिक संतुलन की राजनीति को भी संबोधित करते हैं। आठवें वेतन आयोग का गठन और उसकी संदर्भ-शर्तों की घोषणा ऐसे समय में हुई है जब केंद्र सरकार अपने तीसरे कार्यकाल के दूसरे वर्ष में है और प्रशासनिक ढाँचे में कार्यरत कर्मियों का मनोबल राजनीतिक रूप से निर्णायक हो सकता है। हम आपको बता दें कि केंद्रीय कर्मचारी वर्ग— विशेषकर रेलवे, रक्षा प्रतिष्ठान और डाक विभाग जैसे विभागों में कार्यरत लाखों कर्मचारी लंबे समय से महंगाई और वेतन असमानता को लेकर सरकार से कुछ राहत की अपेक्षा कर रहे थे।
मंत्रिमंडल का यह निर्णय उस मध्यमवर्गीय मतदाता को संदेश देता है जिसने परंपरागत रूप से भाजपा का समर्थन किया है, लेकिन हाल के वर्षों में बढ़ती जीवन-यापन लागत और कर-भार से असंतोष भी झेल रहा है। वेतन आयोग की घोषणा से सरकार यह संकेत दे रही है कि वह स्थिर आय वर्ग के हितों को लेकर सजग है। हालाँकि, इसका वित्तीय प्रभाव कम नहीं होगा, इससे केंद्र और राज्यों के खज़ाने पर भारी बोझ पड़ सकता है। फिर भी, यह फैसला एक राजनीतिक निवेश की तरह देखा जा सकता है जहां राजकोषीय अनुशासन की बजाय लोक-संतुष्टि को प्राथमिकता दी गई है।
दूसरा बड़ा फैसला यानि रबी सीजऩ के लिए उर्वरक सब्सिडी सीधे किसान मतदाता वर्ग से जुड़ा है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जहां छोटे किसान और खेतिहर मज़दूर निर्णायक भूमिका निभाते हैं, वहाँ यह संदेश बेहद असरदार हो सकता है कि केंद्र सरकार कृषि लागत को नियंत्रित रखने के लिए सक्रिय है। फॉस्फेटिक और पोटैसिक उर्वरकों पर सब्सिडी का यह प्रावधान सिफऱ् मूल्य नियंत्रण नहीं बल्कि कृषि इनपुट संकट को थामने का राजनीतिक प्रयास है। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे माल के दाम बढ़े हैं और ऐसे में किसानों को राहत देना ग्रामीण असंतोष को कम करने की रणनीति है।यह निर्णय विशेष रूप से महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि बिहार में कृषि आय और रोजगार दोनों पर निर्भर मतदाता बड़ी संख्या में हैं। इस वर्ग तक किसान-हितैषी सरकार का संदेश पहुँचाना भाजपा-जेडीयू गठबंधन के लिए राजनीतिक रूप से लाभकारी सिद्ध हो सकता है।

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