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लागू हुए नए श्रम कानून

पीएम मोदी का कार्यबल कल्याण की ओर बड़ा कदम

नई दिल्ली। नए श्रम कानून आज से लागू होकर भारत में श्रमिक कल्याण को अभूतपूर्व बढ़ावा दे रहे हैं, जिसमें गिग, प्लेटफॉर्म और महिला श्रमिकों के लिए विशेष प्रावधान हैं। ये सुधार सामाजिक सुरक्षा, समान वेतन और विस्तारित मातृत्व लाभ सुनिश्चित करते हुए लाखों श्रमिकों को औपचारिक दायरे में लाएंगे। प्रधानमंत्री मोदी के इस कदम से कार्यबल के कल्याण को मजबूत करने और आर्थिक समावेश को बढ़ावा देने की उम्मीद है।
पहली बार, श्रम संहिताओं ने गिग वर्क, प्लेटफ़ॉर्म वर्क और एग्रीगेटर्स को औपचारिक रूप से परिभाषित किया है, जिससे डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर काम करने वाले लाखों लोगों को कानूनी स्पष्टता मिली है। एग्रीगेटर कंपनियों को अब अपने वार्षिक कारोबार का 1-2 प्रतिशत एक समर्पित कल्याण कोष में जमा करना होगा, जिसकी अधिकतम सीमा श्रमिकों को किए गए कुल भुगतान का 5त्न होगी। यह कोष सामाजिक सुरक्षा लाभों का समर्थन करेगा।
श्रम एवं रोजगार मंत्री मनसुख मंडाविया ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि आज से देश में नए श्रम संहिता प्रभावी हो गए हैं… ये सुधार केवल साधारण बदलाव नहीं हैं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कार्यबल के कल्याण के लिए उठाया गया एक बड़ा कदम है। डिलीवरी और मोबिलिटी कर्मचारियों को बड़ी राहत देते हुए, घर और कार्यस्थल के बीच यात्रा के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं को अब रोजग़ार से संबंधित माना जाएगा, जिससे कर्मचारी दुर्घटना मुआवजे के पात्र बनेंगे। लाभों की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए, सरकार ने आधार से जुड़ा एक यूनिवर्सल अकाउंट नंबर शुरू किया है, जिससे राज्यों में कल्याणकारी योजनाओं तक आसान और पोर्टेबल पहुँच संभव हो सकेगी।
ये संहिताएँ सभी प्रकार के लैंगिक भेदभाव पर रोक लगाती हैं और समान कार्य के लिए समान वेतन सुनिश्चित करती हैं। महिलाएँ अब रात्रि पाली में काम कर सकती हैं और सभी प्रकार के उद्योगों में काम कर सकती हैं, जिनमें खनन और भारी मशीनरी जैसे पहले प्रतिबंधित क्षेत्र भी शामिल हैं, बशर्ते उनकी सहमति और अनिवार्य सुरक्षा व्यवस्था हो। 26 सप्ताह के सवेतन अवकाश, शिशुगृह सुविधाओं तक पहुँच और घर से काम करने के लचीले विकल्पों के साथ मातृत्व लाभों को और मज़बूत किया गया है। महिला कर्मचारियों को 3,500 रुपये का चिकित्सा बोनस भी मिलेगा। इसके अतिरिक्त, महिला श्रमिकों के लिए परिवार की परिभाषा का विस्तार करके इसमें सास-ससुर को भी शामिल किया गया है, जिससे सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों के तहत आश्रितों का दायरा बढ़ गया है।

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